रेफरल से बिल पासिंग तक ‘सेटिंग’ का आरोप, SECL–रेलवे हेल्थ सिस्टम में फैले नेटवर्क की जांच की मांग तेज; कई डॉक्टरों और PRO की भूमिका पर उठे गंभीर सवाल

कोतमा/बिलासपुर।
एसईसीएल कोतमा अस्पताल से जुड़े कथित “कमीशन कांड” की परतें अब एक बड़े संगठित नेटवर्क की ओर इशारा करती नजर आ रही हैं। सूत्रों से मिल रही जानकारी के अनुसार यह मामला केवल मरीजों के रेफरल तक सीमित नहीं, बल्कि एक सुनियोजित “PRO नेटवर्क” के जरिए पूरे हेल्थ सिस्टम को मैनेज किए जाने का आरोप सामने आ रहा है।
बताया जा रहा है कि बिलासपुर के एक बड़े निजी अस्पताल द्वारा कथित तौर पर विशेष रूप से प्रशिक्षित पीआरओ (Public Relation Officers) तैनात किए गए थे, जिनका काम सिर्फ मरीजों को लाना नहीं बल्कि सरकारी अस्पतालों—खासकर एसईसीएल—से आने वाले केसों को “हैंडल” करना था। इसमें मरीजों का रेफरल, भर्ती प्रक्रिया को आसान बनाना, और इलाज के बाद बनने वाले भारी-भरकम मेडिकल बिलों की फाइलों को आगे बढ़ाना शामिल बताया जा रहा है।
सूत्रों का दावा है कि यह नेटवर्क कई स्तरों पर सक्रिय था—
🔴मरीजों को निजी अस्पतालों तक लाना
🔴इलाज की अवधि और पैकेज को “मैनेज” करना
🔴और अंततः लाखों-करोड़ों के बिल को पास कराना
कुछ मामलों में सम्भावित आरोप है कि मरीजों की भर्ती अवधि अनावश्यक रूप से बढ़ाई गई और महंगे इलाज पैकेज जोड़कर बिल को कई गुना तक बढ़ाया गया। हालांकि अवधि वाली बात की अभी पुष्टि नही हो पाया है ये जांच का विषय है। परंतु चर्चा यहां तक है कि कार्डियोलॉजी और गंभीर बीमारियों के नाम पर 30 से 34 लाख रुपये तक के बिल तैयार कराए गए और उन्हें एसईसीएल के माध्यम से स्वीकृति दिलाकर भुगतान भी कराया जा चुका है।
मामले ने उस समय और गंभीर रूप ले लिया जब यह चर्चा सामने आई कि इसी तरह का रेफरल और बिलिंग नेटवर्क रेलवे के स्वास्थ्य विभाग तक भी फैला है। बिलासपुर के एक वही बड़े निजी अस्पताल को रेलवे मरीजों के इलाज से भी बड़े स्तर पर आर्थिक लाभ मिलने की बात कही जा रही है। उनके ये पीआरओ यहाँ भी सक्रिय है। और इसमें रेलवे के भी एक दो डॉक्टरों और विभाग से जुड़े बाबू की मिलीभगत की आशंका जताई जा रही है।
डॉक्टरों की भूमिका पर भी सवाल
इस पूरे प्रकरण में कोतमा से 28 feb 2026 को रिटायर्ड डॉक्टर अकेले नही है बल्कि वर्तमान में मनेन्द्रगढ़ एसईसीएल में पदस्थ एमडी मेडिसिन का नाम भी चर्चाओं में है। लेकिन सूत्रों का कहना है कि ये मामला केवल एक-दो डॉक्टरों तक सीमित नहीं है।
बताया जा रहा है कि अलग-अलग क्षेत्रों से 8–10 डॉक्टरों की एक सूची भी सामने आई है, जिनकी इस कथित कमीशन कांड में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष भूमिका की जांच की मांग उठ रही है।
‘क्लाइंट’ बनते मरीज, प्रोफेशन बनता व्यापार?
सूत्रों के अनुसार संबंधित बड़े निजी अस्पताल में कार्यरत कुछ पीआरओ को विशेष रूप से सरकारी विभागों के केस “सेट” करने के लिए रखा गया था। यहाँ तक कि एक चर्चा के दौरान अस्पताल प्रबंधन के मुखिया द्वारा कथित तौर पर हमे यह कहा गया कि ये पीआरओ “बड़े अधिकारियों और क्लाइंट्स को हैंडल करने में माहिर हैं।”
सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है—
जब मरीजों को ‘क्लाइंट’ की तरह देखा जाने लगे, तो क्या स्वास्थ्य सेवा वास्तव में सेवा रह जाती है या पूरी तरह व्यापार बन जाती है?
RTI दस्तावेज़ और केंद्रीय जांच की तैयारी
सूत्रों के मुताबिक इस पूरे मामले से जुड़े दस्तावेज़ और आरटीआई से प्राप्त जानकारियों के आधार पर अब केंद्रीय स्तर की जांच एजेंसियों में शिकायत दर्ज कराने की तैयारी चल रही है। यदि ऐसा होता है, तो यह मामला एक बड़े संस्थागत भ्रष्टाचार के रूप में सामने आ सकता है, जिसमें कई स्तरों पर जिम्मेदारियां तय हो सकती हैं।
आगे और बड़ा खुलासा?
सूत्रों का यह भी कहना है कि “कमीशन कांड” तो केवल शुरुआत है। आने वाले समय में दवाइयों के नाम पर किए जा रहे कथित भ्रष्टाचार और मेडिकल चेन में गड़बड़ियों को लेकर भी बड़े खुलासे हो सकते हैं।
फिलहाल सवाल यही—
क्या जांच एजेंसियां इस पूरे नेटवर्क की जड़ तक पहुंच पाएंगी, या फिर यह मामला भी आरोप-प्रत्यारोप के बीच दबकर रह जाएगा?
👉जुड़े रहिए “लोकनायक” के साथ, क्योंकि अगली कड़ी में खुलेंगे और भी बड़े राज…

