
कोतमा/बिलासपुर,
South Eastern Coalfields Limited (एसईसीएल) के कोतमा अस्पताल में पदस्थ रहे डिप्टी CMO डॉ. दिनबन्धु प्रसाद 28 फरवरी 2026 को सेवानिवृत्त हो चुके हैं, लेकिन उनके रिटायरमेंट के साथ ही एक कथित “कमीशन कांड” ने पूरे स्वास्थ्य महकमे में हलचल मचा दी है। सेवानिवृत्ति के बाद सामने आए आरोपों ने एसईसीएल की चिकित्सा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
प्राप्त दस्तावेजों और सूत्रों के हवाले से आरोप सामने आया है कि मरीजों को निजी अस्पतालों में रेफर करने के बदले कमीशन लेने का खेल लंबे समय से चल रहा था। खासतौर पर बिलासपुर के एक बड़े निजी अस्पताल और अपोलो अस्पताल का नाम चर्चा में है, जहां मरीज भेजने के बदले आर्थिक लाभ लेने की बात कही जा रही है। आरोप यह भी है कि अस्पतालों से व्यक्तिगत कारणों और पारिवारिक जरूरतों के लिए आर्थिक सहयोग भी लिया जाता था।
इस पूरे मामले को लेकर कई आरटीआई आवेदन लगाए गए हैं, जिनमें मरीजों की रेफरल प्रक्रिया, भुगतान से जुड़ी जानकारियां और प्रशासनिक स्वीकृतियों का ब्योरा मांगा गया है। सूत्रों के मुताबिक मामले की जानकारी मिलने के बाद विजिलेंस विभाग ने अंदरूनी स्तर पर पड़ताल शुरू कर दी है, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि अभी तक नहीं हुई है।
मामले में एक और गंभीर पहलू सामने आया है। जानकारी के अनुसार एक बड़े निजी अस्पताल में एसईसीएल के मरीजों को जरूरत से ज्यादा समय तक भर्ती रखकर भारी-भरकम बिल बनाए गए। सूत्रों का दावा है कि कुछ कार्डियोलॉजी मरीजों का बिल 30 से 34 लाख रुपये तक बनाया गया, जिसे कथित तौर पर अस्पताल और संबंधित अधिकारियों की सांठगांठ से एसईसीएल से पास भी करा लिया गया।
बताया जा रहा है कि यह कोई एक-दो मामलों तक सीमित नहीं है, बल्कि ऐसे कई बड़े बिलों से जुड़ी फाइलों की जानकारी सामने आई है। यदि पिछले दो वर्षों की अवधि का आकलन किया जाए तो अनुमान लगाया जा रहा है कि करोड़ों रुपये के बिल इस प्रक्रिया के तहत पास कराए गए हो सकते हैं।
सूत्रों के अनुसार इस पूरे नेटवर्क को संचालित करने के लिए संबंधित निजी अस्पताल द्वारा कथित तौर पर दो ट्रेंड पीआरओ भी रखा गया है, जिसका काम मरीजों के रेफरल से लेकर बिल पास कराने तक की पूरी प्रक्रिया को मैनेज करना बताया जा रहा है।
मामले की गंभीरता इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि आरोप है कि यह कथित रेफरल-कमीशन नेटवर्क सिर्फ एसईसीएल तक सीमित नहीं, बल्कि रेलवे के स्वास्थ्य विभाग तक भी फैला है। चर्चा है कि बिलासपुर का वही बड़ा निजी अस्पताल रेलवे के मरीजों के रेफरल से भी बड़े स्तर पर लाभान्वित हो रहा है। यदि जांच का दायरा बढ़ता है तो यह मामला संस्थागत स्तर के बड़े भ्रष्टाचार के रूप में सामने आ सकता है।
डॉ. दिनबन्धु प्रसाद के रिटायर हो जाने के बाद अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि क्या जांच एजेंसियां इस पूरे प्रकरण में ठोस कार्रवाई करती हैं या मामला कागजों में दबकर रह जाएगा। मामले को लेकर जल्द ही CVC (सेंट्रल विजिलेंस कमीशन) में शिकायत करने की तैयारी भी की जा रही है।
इस पूरे मामले की जानकारी एसईसीएल के उच्च अधिकारियों को भी है परंतु उनका मौन रवैया एक प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है।जानकारी के बाद एसईसीएल स्वास्थ विभाग ने एक मेल कर पिछले 6 महीने की डिटेल मांगी है, पर ये कार्यवाही की प्रक्रिया है या खानापूर्ति ये पता नही, क्योंकि सूत्रों से पता चला है कि इनके मेल में मांगी गई जानकारी के बाद पता चला है कि उस निजी अस्पताल के वही दो पीआरओ एसईसीएल से पुरानी गड़बड़ी वाली फाइलों की हेराफेरी में लगे हुए है, अगर ये बात सत्य है तो एसईसीएल को सतर्क होने की जरूरत है।
अब पूरे प्रकरण की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच की मांग उठने लगी है, ताकि सच सामने आ सके और यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो जिम्मेदार लोगों पर सख्त कार्रवाई सुनिश्चित हो सके।

