एसडीएम का ‘नया फार्मूला’: दो-दो तहसीलों में तहसीलदारों की तैनाती आदेश पर उठ रहे प्रशासनिक संतुलन और ग्रामीण हितों के सवाल

तहसील बाटने का जिम्मा कलेक्टर नही अब एसडीएम के पास हो गया है पर इस तरह का तहसील आवंटन, ये आधा अधूरा एवं अन्याय पूर्ण है क्योंकि बेलतरा नायब तहसीलदार के रूप में सहोरिक यादव का भी आदेश हुआ है पर उन्हें बेलतरा तहसील के ही हल्के प्रदान किए गए हैं उनसे ऐसी क्या नाराजगी जो उन्हें बिलासपुर के शहरी हल्के नहीं दिए गए और गलती तो तहसीलदार बेलतरा मनीषा झा की भी नहीं है, उन्हें केवल बेलतरा के हल्के क्यों दिए गए हैं उन्हें भी तो शहर के खमतराई , मोपका, लिंगियाडीह , बिरकोना,कोनी आदि हल्के दिए जा सकते हैं। साथ ही साथ अन्य अनुभागों में भी यह व्यवस्था लागू की जा सकती हैं जब एक नायब तहसीलदार दो तहसीलों में काम संभाल सकता है तो दूसरे अन्य तहसीलदार और नायब तहसीलदार की योग्यता को आप कम क्यों आँक रहे हैं। और फिर बात बेलतरा और बिलासपुर की क्यों हो रही है मैं तो कहूंगा तखतपुर तहसीलदार को सकरी के भी कुछ हल्के दिए जाएं और बिल्हा की तहसीलदार को बोदरी तहसील के कुछ हल्के देकर आदरणीय एसडीएम साहब को सभी तहसीलदारों को पुरस्कृत करना चाहिए।
जिस तरह वर्तमान आदेश के पहले नायब तहसीलदार टोप लाल सिदार को भी बेलतरा तहसील का एक हल्का और बिलासपुर के पांच हल्के दे दिया गया था, इस तरह बाकी तहसीलों में भी सभी एसडीएम द्वारा यह परिपाटी चालू करने में क्या खर्च है बेलगहना नायब तहसीलदार को भी कोटा के हल्के दे दिए जाएं ,मस्तूरी तहसीलदार को सीपत तहसील के हल्के दे दिए जाएं।
अब कलेक्टर साहब को तो आगामी तहसीलदारों के स्थानांतरण में तहसील का आवंटन बंद कर देना चाहिए, उन्हें खाली अनुभागवार स्थानांतरण सूची निकालना चाहिए क्योंकि एसडीएम साहब कलेक्टर साहब के आदेश को ठेंगा दिखाकर दूसरे तहसील में तहसीलदारों को हल्के प्रदान तो कर ही सकते है।
वैसे इसका विपरीत भी क्यों ना किया जाए और क्यों ना बिलासपुर के तहसीलदारों को या नायब तहसीलदारों को बेलतरा के हल्के दिए जाएं, क्योंकि सभी दो-दो तहसीलों में आराम से जाकर अपने कार्यों का संपादन आसानी से कर ही सकते हैं, और बेलतरा के कृषक काम पड़ने पर बिलासपुर तहसील आकर अपना काम करवा ही सकते हैं, उनके लिए 30 किलोमीटर की दूरी कौन सी बड़ी चीज है जब उसका तहसीलदार बिलासपुर तहसील के कुछ हलकों में पदस्थ है।
मैं तो कहूंगा शासन बिना मतलब इतने सारे उप तहसीलों और तहसीलों का निर्माण कर रहा है जबकि शासन द्वारा तहसीलों की दूरी को मिटाने तहसील बनाई गई है बेलतरा तहसील के आखिरी गांव मंजू पहरी का कोई व्यक्ति तहसीलदार से काम बनने पर बिलासपुर आने पर विवश होगा तो इतनी सारी तहसीलों का निर्माण करने का शासन का कोई औचित्य नहीं है।
शासन को तो पूरे पॉवर एसडीएम को दे देने चाहिए कि वह अपने हिसाब से तहसीलों को किसी प्रकार से तोड़कर अपने सुविधा अनुसार ग्रामीणों की दिक्कतों को दरकिनार कर आदेश कर सकता है।
फिलहाल यह पूरा मामला राजस्व विभाग के भीतर चर्चा और असंतोष का विषय बना हुआ है। अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस पर कोई स्पष्टीकरण देता है या फिर यह “हल्का आवंटन” की नई परंपरा आगे भी इसी तरह जारी रहती है।
अंतिम में एक सवाल उठता है कि क्या बेलतरा के तहसीलदारों से सिर्फ एक हल्का नही संभल रहा ?

