
श्री मंगला हॉस्पिटल में आज मनोरोग चिकित्सा को लेकर एक भव्य निशुल्क स्वास्थ्य शिविर का सफल आयोजन किया गया। इस शिविर में डॉ. प्रकाश नारायण शुक्ला (रायपुर) एवं उनकी 12 सदस्यीय विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम ने अपनी सेवाएं प्रदान कीं।
शिविर में छोटे बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक लगभग 150 से अधिक मरीजों ने मनोरोग परामर्श एवं उपचार का लाभ लिया। मरीजों और उनके परिजनों में इस पहल को लेकर खासा उत्साह देखने को मिला। लाभार्थियों ने इस निशुल्क शिविर के लिए श्री मंगला हॉस्पिटल, डॉ. प्रकाश नारायण शुक्ला एवं उनकी पूरी टीम के प्रति आभार व्यक्त किया।
इस अवसर पर डॉ. प्रकाश नारायण शुक्ला ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि मनोरोग उपचार कोई नया विषय नहीं है, बल्कि भारत में इसका इतिहास अत्यंत प्राचीन है। उन्होंने कहा कि हमारे वेदों और प्राचीन ग्रंथों में भी मानसिक स्वास्थ्य और उसके उपचार की विस्तृत व्याख्या मिलती है, जिसे आज आधुनिक चिकित्सा विज्ञान और अधिक सुदृढ़ रूप में आगे बढ़ा रहा है।
शिविर के सफल आयोजन से यह स्पष्ट हुआ कि मानसिक स्वास्थ्य को लेकर समाज में जागरूकता बढ़ रही है, और ऐसे आयोजनों से जरूरतमंद मरीजों को समय पर सही परामर्श एवं उपचार मिल पा रहा है।

इस खबर में डॉ. प्रकाश नारायण शुक्ला के वक्तव्य को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने बताया कि मानसिक स्वास्थ्य (मनोरोग चिकित्सा) की अवधारणा भारत में हजारों वर्ष पुरानी है। हमारे वेदों और आयुर्वेदिक ग्रंथों में मन, विचार, भावनाओं और मानसिक संतुलन को स्वास्थ्य का मूल आधार माना गया है।
विशेष रूप से अथर्ववेद में मानसिक अशांति, भय, चिंता, अवसाद और नकारात्मक विचारों से मुक्ति के लिए मंत्र, ध्यान और औषधीय उपचारों का उल्लेख मिलता है। अथर्ववेद में कहा गया है कि मन की विकृति शरीर को रोगी बनाती है, और जब मन शांत होता है तो शरीर स्वयं स्वस्थ होने लगता है।
आयुर्वेद के अनुसार चित्त, बुद्धि और अहंकार—तीनों का संतुलन बिगड़ने पर मानसिक रोग उत्पन्न होते हैं। चरक संहिता में वर्णन है कि अत्यधिक शोक, भय या क्रोध से व्यक्ति उन्माद (आज की भाषा में मानसिक विकार) की स्थिति में चला जाता है। इसके उपचार के लिए
डॉ. शुक्ला ने उदाहरण देते हुए बताया कि जैसे आज डिप्रेशन या एंग्जायटी में काउंसलिंग और मेडिटेशन उपयोगी माने जाते हैं, उसी तरह प्राचीन काल में भी मंत्रोच्चार, ध्यान और सात्विक जीवन को मानसिक रोगों की प्रमुख औषधि माना गया था।
उन्होंने कहा कि आज की आधुनिक मनोरोग चिकित्सा, हमारे प्राचीन ज्ञान की ही वैज्ञानिक व्याख्या है, और जब दोनों का समन्वय होता है, तब उपचार अधिक प्रभावी बनता है।
इस जानकारी ने शिविर में उपस्थित मरीजों और उनके परिजनों को मानसिक रोगों के प्रति भ्रम और भय से मुक्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे शिविर न केवल चिकित्सा बल्कि जागरूकता का केंद्र भी बना।



