
बिलासपुर।
मतदाता सूची पुनरीक्षण के बीच एक हैरान करने वाली घटना सामने आई है, जिसमें गरियाबंद के डिप्टी डायरेक्टर ओंकार प्रसाद तिवारी द्वारा बिलासपुर के बीएलओ को न केवल अपमानित किया गया बल्कि कलेक्टर के नाम की खुली धमकी तक दे डाली गई।
जानकारी के अनुसार, बीएलओ किशन यादव—जो मूल रूप से पीएचई विभाग के कर्मचारी हैं—मतदाता ओंकार प्रसाद तिवारी के घर 2003 से संबंधित जानकारी और फ़ॉर्म के लिए पहुंचे थे। लिंक उपलब्ध कराने के बाद तिवारी ने फोन कर जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया, उसने पूरे बीएलओ तंत्र को हिला कर रख दिया।
फोन पर तिवारी ने कहा—
“मैं सुपर क्लास वन अधिकारी हूँ… तुम्हें तमीज़ नहीं कि मेरे जैसा अधिकारी से कैसे बात की जाती है? लगाऊँ अभी संजय अग्रवाल को फोन? तुम्हारे बिलासपुर कलेक्टर मेरे बैच के हैं… कर दूँ शिकायत तो सीधे लाइन में लग जाओगे! चुपचाप कल सुबह मेरे घर आकर तीनों फ़ॉर्म भरकर जाना।”
यहाँ तक कि ‘सुपर क्लास वन’ जैसे अस्पष्ट पद का हवाला देकर तिवारी ने अपनी पद की शक्ति का प्रदर्शन किया और कलेक्टर के नाम को बार-बार ढाल बनाकर डराने की कोशिश की।
उधर, पूरे घटनाक्रम के दौरान बीएलओ किशन यादव ने अद्वितीय धैर्य दिखाते हुए केवल
“जी सर…”
कहकर अपनी पद-गरिमा और शासन द्वारा सौंपे दायित्व का सम्मान बनाए रखा।
अब बड़ा सवाल यह है—
आख़िर ‘सुपर क्लास वन’ किस पद को कहा जा रहा है?
क्या डिप्टी डायरेक्टर जैसे जिम्मेदार पद पर बैठे
अधिकारी को अपनी नौकरी, बैच और कलेक्टर के नाम की धमकी देकर एक बीएलओ को डराना शोभा देता है?
जबकि मतदाता सूची में कही भी पदनाम भरने का कॉलम नही होता तो भला एक बीएलओ को कैसे पता चलेगा कि साहब डिप्टी डायरेक्टर है और इनको विशेष सुविधा देना है।
जबकि यही बीएलओ सुबह 8:30 बजे से रात 7–8 बजे तक घर-घर जाकर शासन द्वारा दिए गए कार्य को पूरी निष्ठा से निभा रहे हैं।
सूत्र बताते हैं कि ओंकार प्रसाद तिवारी वर्तमान में गरियाबंद में डिप्टी डायरेक्टर के पद पर पदस्थ हैं, लेकिन उनसे इस घटना पर प्रतिक्रिया लेने के लिए किए गए कॉल उन्होंने रिसीव नहीं किए।
यह पूरा मामला एक गंभीर प्रश्न छोड़ जाता है—
क्या सरकारी सेवा में जिम्मेदारी बड़ी होती है या पद का घमंड?


