KVKs के कर्मचारियों के साथ भेदभाव एवं संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन के विरोध में आंदोलन की चेतावनी

Gajendra Singh
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रायपुर, छत्तीसगढ़ – तकनीकी कर्मचारी संघ, इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय (IGKV) ने आज विरोध प्रदर्शन करते हुए एक ज्ञापन के माध्यम से विश्वविद्यालय प्रशासन को KVKs (कृषि विज्ञान केंद्रों) में कार्यरत अधिकारियों एवं कर्मचारियों के साथ हो रहे संस्थागत भेदभाव, सेवा शर्तों के उल्लंघन और संवैधानिक अधिकारों की अनदेखी के विरोध में 15 दिनों के भीतर समाधान न होने पर राज्यव्यापी आंदोलन की चेतावनी दी है।

प्रमुख मुद्देः

1. पेंशन एवं सामाजिक सुरक्षा से वंचित करनाः KVK कर्मचारियों को NPS/OPS जैसे मूलभूत लाभों से अनुचित तरीके से वंचित किया गया है।

2. मेडिकल एवं अन्य भत्तों की समाप्तिः बिना किसी सूचना के मेडिकल भत्ते रोक दिए गए, जिससे दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यरत कर्मचारियों को गंभीर कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।

3. कैरियर उन्नयन योजना (CAS) का उल्लंघनः योग्य कर्मचारियों को पदोन्नति और वेतन वृद्धि से अनुचित रूप से रोका गया है।

4. सेवा-निवृत्ति आयु में भेदभावः विश्वविद्यालय के नियमों के विपरीत KVK कर्मचारियों को 60 वर्ष की आयु में ही सेवानिवृत्त किया जा रहा है, जबकि अन्य कर्मचारियों के लिए यह सीमा 62/65 वर्ष है।

5. सेवानिवृत्ति उपरांत लाभों की अनदेखी: पेंशन, ग्रेच्युटी और चिकित्सा सुविधाएँ जैसे अधिकार नहीं दिए जा रहे हैं।

6. विशुद्ध अस्थायी नियुक्तियों का विरोधः विश्वविद्यालय द्वारा KVKs में विशुद्ध अस्थायी नियुक्तियाँ की जा रही हैं, जो IGKV अधिनियम, 1987 और ICAR के समझौते का उल्लंघन है।

कर्मचारी संघ की मांगें:

* KVK कर्मचारियों को विश्वविद्यालय के समकक्ष पदों के समान सेवा लाभ प्रदान किए जाएँ।

* NPS/OPS, मेडिकल भत्ते और CAS योजना को तुरंत बहाल किया जाए।

* सेवा-निवृत्ति आयु को 62/65 वर्ष किया जाए।

* सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन, ग्रेच्युटी और चिकित्सा सुविधाएँ प्रदान की जाएँ।

* विवादित अस्थायी नियुक्तियों के विज्ञापन को तुरंत रद्द किया जाए।

चेतावनीः

यदि 15 दिनों के भीतर इन मुद्दों का समाधान नहीं किया गया, तो तकनीकी कर्मचारी संघ संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) व (b) के तहत राज्यव्यापी आंदोलन शुरू करेगा। यह आंदोलन विश्वविद्यालय की शैक्षणिक, अनुसंधान और प्रसार गतिविधियों को प्रभावित कर सकता है। संघ ने स्पष्ट किया है कि ऐसी स्थिति के लिए विश्वविद्यालय प्रशासन की निष्क्रियता और भेदभावपूर्ण नीतियाँ जिम्मेदार होंगी।

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