“रोक के बावजूद रजिस्ट्री कैसे? — छत्तीसगढ़ के सब-रजिस्ट्रार कार्यालय बने नियमों के सबसे बड़े उल्लंघनकर्ता”

छत्तीसगढ़, बिलासपुर | विशेष रिपोर्ट
इस वर्ष छत्तीसगढ़ के राजस्व विभाग में कई अहम बदलाव किए गए। नामांतरण की प्रक्रिया को तहसीलदार से हटाकर सब-रजिस्ट्रार कार्यालयों से जोड़ा गया, वहीं 5 डिसिमिल से कम कृषि भूमि की खरीदी-बिक्री और भूमि के छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटवारे पर रोक लगाई गई। इन नियमों का मुख्य उद्देश्य अवैध प्लाटिंग पर नियंत्रण बताया गया।
लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है।
“तहसील की सख्ती, पंजीयन की ढील — राजस्व विभाग में नियमों का दोहरा चेहरा”
“आदेश मौखिक, खेल वास्तविक — डायवर्टेड ज़मीन के टुकड़ों पर करोड़ों का खेल?”
सूत्रों के अनुसार, नियमों के लागू होने के बाद एक विभाग को अप्रत्याशित “लाभ” मिला है। आमजन और भूमि से जुड़े लोगों का कहना है कि कुछ पंजीयन कार्यालयों में इन नियमों का चयनात्मक पालन हो रहा है, जबकि कुछ मामलों में इन्हीं नियमों की खुलेआम अनदेखी की जा रही है।
जानकारी के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति की भूमि पहले से डायवर्टेड है तो वह उसे बेच सकता है, लेकिन उसी भूमि को छोटे टुकड़ों में विभाजित कर बेचना नियमों के अनुसार निषिद्ध है। इसके बावजूद, ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जहाँ डायवर्टेड भूमि के छोटे टुकड़ों की रजिस्ट्री कथित रूप से कर दी गई।
सबसे गंभीर मामला तब सामने आता है जब बिलासपुर नगर निगम द्वारा अवैध प्लाटिंग घोषित किए गए कुछ खसरों की रजिस्ट्री भी होती पाई गई है। जानकारी के मुताबिक, बिलसलूर नगर निगम आयुक्त द्वारा इन खसरों की सूची एसडीएम कार्यालय को भेजी गई थी और एसडीएम द्वारा सब-रजिस्ट्रार को स्पष्ट निर्देश दिए गए थे कि इन पर रजिस्ट्री पर रोक लगाई जाए। इसके बाद भी इन खसरों पर रजिस्ट्री होना कई सवाल खड़े करता है।
जब इस संबंध में सब-रजिस्ट्रार साहब से सवाल किया गया तो जवाब मिला —
> “दिन भर में 30 से 40 रजिस्ट्री होती हैं, अब सब पर नजर रखना संभव नहीं है।”
यह जवाब व्यवस्था की लापरवाही को उजागर करता है या किसी और गहरी कहानी की ओर संकेत करता है — इसका खुलासा जांच का विषय है।
फिलहाल हमारे पास बिलासपुर पंजीयन विभाग के छोटे टुकड़ों में हुई कुछ रजिस्ट्री के दस्तावेजी प्रमाण मौजूद हैं, जबकि कथित लेन-देन की पुष्टि के लिए आगे की पड़ताल जारी है।
सवाल यह है कि:
क्या राजस्व नियम सिर्फ कागजों तक सीमित हैं?
क्या एक ही कानून का अलग-अलग जगह अलग मतलब निकाला जा रहा है?
और क्या कुछ चुनिंदा अधिकारियों के लिए नियम “लचीले” हो जाते हैं?
छत्तीसगढ़ में अवैध प्लॉटिंग पर रोक लगाने को छोटे-छोटे जमीन के टुकड़ों की रजिस्ट्री बंद की गई…
लेकिन हकीकत?
वही छोटे टुकड़े आज भी बिक रहे हैं
अवैध प्लाटिंग वाले खसरे भी रजिस्टर्ड
आदेश मौजूद, लेकिन पालन नदारद
तो क्या नियम केवल आम लोगों के लिए हैं?
जब सरकार नियम बनाती है तो उसका उद्देश्य अव्यवस्था को रोकना होता है, न कि उसे नए रास्ते देना।
आज छत्तीसगढ़ में छोटे जमीन टुकड़ों पर रोक के बावजूद रजिस्ट्री होना ये साबित करता है कि या तो सिस्टम अंधा है या फिर कुछ आँखें जानबूझकर बंद हैं।
अगर बिलासपुर नगर निगम कमिश्नर , SDM और सरकार के आदेशों को दरकिनार कर भी जमीन बिक रही है, तो फिर आम आदमी कानून का सम्मान क्यों करे?
अब बड़ा सवाल – लापरवाही या मिलीभगत?
सवाल बड़ा नहीं, सिस्टम छोटा हो गया है।
और लोकनायक जल्द इस छोटे सिस्टम के “बड़े नाम” सामने लाने वाला है।
“छोटे टुकड़े, बड़ी डील! — जमीन के हर टुकड़े में छिपा है एक खेल”
कौन सा पंजीयन कार्यालय और किस क्षेत्र में हुआ है ये खेल इन सभी सवालों के जवाब आने वाले दिनों में सामने लाए जाएंगे, पूरे दस्तावेजी साक्ष्य के साथ।
जुड़े रहिए लोकनायक के साथ — अगला खुलासा जल्द।


