बिलासपुर ईडब्लूएस फर्जीवाड़ा : ओटीपी का दुरुपयोग या सुनियोजित षड्यंत्र ?

Gajendra Singh
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तहसील में गहराया शक – वकील, क्लर्क और प्राइवेट कर्मचारी पर उठ रहे सवाल

जांच के बाद कि जाएगी कार्यवाही : गरिमा ठाकुर

बिलासपुर।
डॉक्टर बनने का सपना देखने वाले कुछ छात्रों ने फर्जी ईडब्लूएस प्रमाणपत्र बनवाकर मेडिकल कॉलेज में दाखिले की कोशिश की। मामला अब बड़े घोटाले का रूप लेता जा रहा है। सूत्रों के अनुसार कुल 08 छात्रों के नाम इसमें सामने आए हैं, जिनमें 06 छात्राएं और 02 छात्र शामिल हैं।
इनमें से 3 से 4 प्रमाणपत्र फर्जी होने की आशंका जताई जा रही है। चौंकाने वाली बात यह है कि तहसील कार्यालय से मूल दस्तावेज ही उपलब्ध नहीं कराए जा रहे हैं, जिससे संदेह और गहराता जा रहा है कि इन्हें जानबूझकर गायब किया गया है।

हमारे न्यूज़ पोर्टल “लोकनायक” के पास सभी छात्रों के ईडब्लूएस प्रमाणपत्र की कॉपियां मौजूद हैं, जिन पर अलग-अलग सील लगी हुई है। यह तथ्य स्पष्ट रूप से संकेत देता है कि गड़बड़ी गहरी है।

तहसीलदार गरिमा ठाकुर का रुख सख्त

तत्कालीन तहसीलदार गरिमा ठाकुर का कहना है कि इन दस्तावेजों पर उनके हस्ताक्षर फर्जी हैं। उन्होंने खुद यह मुद्दा उठाया, जिसके बाद मामला तूल पकड़ गया।
उनका साफ कहना है कि –
“जांच की जा रही है, दोषी जो भी पाया जाएगा, उस पर कार्यवाही तय है। इसकी जानकारी उच्च अधिकारियों और कलेक्टर को भी दी गई है।”
विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर तहसीलदार की भूमिका संदिग्ध होती, तो वे खुद इस मुद्दे को उजागर नहीं करतीं।

संदेह की सुई तीन ओर

1. क्लर्क प्रल्हाद सिंह नेताम

ग्रेड-3 क्लर्क नेताम उस समय तहसीलदार गरिमा ठाकुर के अधीन कार्यरत थे। ईडब्लूएस प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया में उनका अहम रोल माना जाता है।
नियम के अनुसार, ऑनलाइन अपलोड करने के बाद नस्ती (फाइनल प्रोसेस) करने हेतु तहसीलदार के मोबाइल पर आने वाला ओटीपी क्लर्क ही डालता है।
तहसीलदार का कहना है कि दिनभर में आने वाले ओटीपी क्लर्क को ही दिए जाते हैं। वहीं, नेताम का कहना है कि उन्होंने ओटीपी लिया ही नहीं। यह विरोधाभास उनकी भूमिका पर संदेह खड़ा करता है।

2. वकील

बिलासपुर तहसील में पहले भी अगस्त 2023 में एक वकील के खिलाफ फर्जी शील सिग्नेचर कर निवास एवं आय प्रमाणपत्र बनाने के मामले में जांच एवं कार्यवाही के लिए तत्कालीन तहसीलदार अतुल वैष्णव ने शिकायत किया था।
इस बार भी एक वकील पर शक जताया जा रहा है। एक परिजन ने तो साफ कहा है कि दस्तावेज उसी वकील ने तैयार किया।
तहसील में लोग बताते हैं कि यह वकील केवल जाति, आय और निवास प्रमाणपत्र बनाने के “ठेके” उठाता है और इसके बदले मोटी फीस वसूलता है। सुबह से शाम तक तहसील परिसर में इनकी मौजूदगी आम बात है।

3. प्राइवेट कर्मचारी लोनिया

प्राइवेट कर्मचारियों की मौजूदगी तहसील, एसडीएम और पटवारी कार्यालयों में आम हो चुकी है। और इसपर जब खुद एसडीएम ही मौन है तो भला दूसरे अदिनस्त कर्मचारी इसका लाभ क्यों न ले।
ईडब्लूएस मामले में क्लर्क नेताम के साथ मौजूद प्राइवेट कर्मचारी लोनिया पर भी संदेह है। नेताम का कहना है कि संभवतः नस्ती का कार्य लोनिया ने किया होगा।
क्योंकि प्राइवेट कर्मचारियों पर नौकरी जाने का डर नहीं होता, ऐसे में उनके कार्य-चरित्र पर सवाल उठना लाजिमी है।

उठते हैं कई अनसुलझे सवाल

तहसीलदार गरिमा ठाकुर के नकली हस्ताक्षर करने की हिम्मत आखिर किसने की?

अलग-अलग सील का इस्तेमाल क्यों हुआ?

फर्जी शील और हस्ताक्षर बनाने वाला कौन है?

क्लर्क, वकील और प्राइवेट कर्मचारी – किसकी कितनी भूमिका है?

इस षड्यंत्र का मास्टरमाइंड कौन है?

आखिर कब तक बिलासपुर तहसील बदनाम होती रहेगी?

लोकनायक की टीम इस घोटाले की हर परत उजागर करेगी और आगे की अपडेट्स आप तक पहुँचाएगी।

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