“जिन्हें भगवान समझा, उन्होंने ही मोल-भाव शुरू कर दिया”

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) – आज के समय मे शिक्षा संस्थान और स्वास्थ विभाग ये दोनों ही विभाग ऐसे है जो सीधे जनता से जुड़ा होता है। और आम आदमी इसके लिए अपना सम्पूर्ण कुछ लुटाने को त्यार रहता है। क्योंकि उन्हें उम्मीद होता है कि उनके साथ जो होगा अच्छा ही होगा, परन्तु क्या ऐसा है ?
आज के समय मे खास कर प्राइवेट संस्थान में ये धांधली ज्यादा ही है। प्राइवेट स्कूल हो या प्राइवेट हॉस्पिटल दोनो जगह कमीशन का खेल खूब फलफूल रहा है और उच्च अधिकारियों आँखे मूंद बैठे है।
यह एक सशक्त, संवेदनशील और जनजागरण करने वाला लेख है, जो सीधे आम जनता की उस पीड़ा को उजागर करता है जो आज की स्वास्थ्य सेवाओं में व्यापारीकरण के कारण झेलनी पड़ रही है। इसमें कई गंभीर बिंदुओं को उठाया गया है — कमीशन, रेफरल सिस्टम, झोलाछाप नेटवर्क, सरकारी डॉक्टरों की संलिप्तता और प्रशासन की निष्क्रियता।
आइये बताते है प्राइवेट हॉस्पिटलों के बारे में
जहाँ डॉक्टरों को भगवान का दर्जा दिया जाता है, वहाँ शायद यह कल्पना नहीं की गई थी कि एक दिन वही भगवान रूपी चेहरे, इलाज को धंधा बना देंगे। जो अपने स्वार्थ के लिए मरीजों को सिर्फ और सिर्फ पैसा कमाने का जरिया बना लेंगे। आज के समय मे प्राइवेट हॉस्पिटलों में इलाज के नाम पर खुलेआम कमीशन का खेल खेला जा रहा है। हम आपको आज एक ऐसे हॉस्पिटल के बारे में बताएंगे जो इसी कड़ी में लम्बा कमीशन का खेल खेल रहा है।
◾ मरीज या कमीशन के जरिये पैसे का मशीन ,
हम आपको आज बता रहे है बिलासपुर के एक जानेमाने बड़े हॉस्पिटल के बारे में जो कमीशन के जरिये मरीजों के इलाज के एवज में सिर्फ और सिर्फ पैसा कमाने में लगा है। सूत्रों और पीड़ितों के अनुसार इस हॉस्पिटल में रेफरल नेटवर्क के जरिए मरीजों को लाकर उनके इलाज पर खर्च की गई राशि का 20-25% तक का कमीशन बाहर के डॉक्टरों और दलालों को देते हैं।
उदाहरण के तौर पर, यदि मरीज पर ₹1 लाख का बिल बनता है, तो ₹20,000 से ₹25,000 सीधे रेफरल एजेंट की जेब में चला जाता है। ये बजट आखिर किसके जेब पे पड़ता होगा ?
अगर आपका इलाज अच्छा है तो ये कमीशन क्यों ?
◾ कमीशन के नेटवर्क जाल कैसे चलता है
शासन जिन झोलाछाप डॉक्टरों को पकड़ने में लगी रहती है यही झोलाछाप डॉक्टर इन अस्पतालों के मशीहा बने बैठे है।
यही क्यों यहाँ तो सरकारी अस्पतालों के डॉक्टर भी इसमें बहुताय संख्या में इस सूची में जुड़े हुए है।
कमीशन देने वाले डॉक्टरों का एक ही मकशद होता है पेशेंट लाओ और बैठे बैठे कमीशन ले जाओ।
मरीज के हिसाब से कमीशन
गंभीर बीमारी वाले मरीज देने वाले बड़ा कमीशन और इसके लिए जानबूझकर गंभीर मरीजों को चुना जाता है ताकि इलाज लंबा खिंच सके और ज्यादा मुनाफा हो।
◾ पीड़ितों की मजबूरी
कई मरीज और उनके परिजन इस परेशानी से ग्रसित है पर वो क्या कर सकते है बीमारी का गंभीर रूप और जाँच के नाम पे उन्हें डरा जो दिया जाता है।
उन्हें अनावश्यक ICU में भर्ती रखा गया।
महंगे टेस्ट कराए गए।
इलाज को जानबूझकर लंबा खींचा जाता है।
आज का चिकित्सा सेवा व्यापारीकरण
इन सब के बीच सबसे अधिक नुकसान उन गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों को होता है, जो इलाज की उम्मीद में अपनी जीवनभर की जमापूंजी खर्च कर देते हैं और इलाज के साथ साथ इलाज के नाम पर लूट कर जाता है।
प्रशासन और मेडिकल ऑफिसर की भूमिका पर सवाल
क्या प्रशासन या विभाग के मेडिकल ऑफिसर का इस ओर ध्यान नही जाता या ध्यान देना नही चाहते। आखिर ये कैसे हो सकता है कि इतना बड़ा कमीशन का जाल बिछा हो और उन्हें पता न हो। इसका जीवंत उदाहरण तो सिम्स के सामने या आजूबाजू खड़े प्राइवेट अस्पतालों के एबुलेंस ही चीख चीख के बताते है कि क्या खेल चल रहा है।
यहाँ तो खुद सरकारी डॉक्टर भी इस खेल में जुड़े हुए है और मरीज भेज पैसा कमा रहे है।
हम ऐसे ही एक अस्पताल के बारे में बात कर रहे है जो शहर के साथ साथ अलग अलग जिलों से डाक्टरों के जरिये मरीजो को बुला उन्हें लंबा कमीशन दे रहे है।
एक सवाल
यह मामला सिर्फ एक डॉक्टर या एक अस्पताल का नहीं है — यह पूरे स्वास्थ्य तंत्र की साख का सवाल है।
क्या स्वास्थ्य व्यवस्था को व्यापारीकरण होने से बचाया नही जा सकता ?
या फिर मरीजों की जान का सौदा यूँ ही चलता रहेगा ?
समय रहते अगर प्रशासन नींद से नही जागी और इनके ऊपर कार्यवाही नही की गई तो चिकित्सा सेवा जिसे लोग सेवा भाव से जानते है उसे खत्म होकर व्यापार में तब्दील होते देर नही लगेगा।

हमारा उद्देश्य कमियों को उजागर करना है — पूरे स्वास्थ्य तंत्र को एक ही तराजू में तौलना अन्यायपूर्ण है। कुछ गिने-चुने लालची तत्वों की वजह से उन डॉक्टरों और अस्पतालों की साख पर भी आंच आती है, जो ईमानदारी, सेवा और समर्पण के साथ अपने कार्य में लगे हुए हैं।
हमे इस बात को लेख में शामिल करना ज़रूरी है ताकि संतुलन बना रहे और यह स्पष्ट हो कि हमारा उद्देश्य व्यवस्था की कमियों को उजागर करना है, न कि सभी डॉक्टरों पर संदेह करना।
सेवा भाव अभी भी जीवित है — सब पर न उठे उंगली
हालांकि यह भी सच है कि आज भी कई डॉक्टर और अस्पताल ऐसे हैं जो पूरी ईमानदारी और सेवा-भाव से काम कर रहे हैं। उनकी कार्यशैली न सिर्फ प्रशंसा के योग्य है बल्कि वे समाज में स्वास्थ्य सेवाओं की रीढ़ बने हुए हैं। अफसोस इस बात का है कि कुछ लालची तत्वों के कारण अब आम जनता पूरे स्वास्थ्य तंत्र पर संदेह की नजर से देखने लगी है — जो कहीं न कहीं उन ईमानदार चिकित्सकों के लिए भी अन्यायपूर्ण है।
जरूरत इस बात की है कि गलत लोगों को बेनकाब किया जाए और सही लोगों को प्रोत्साहित किया जाए, ताकि जनता का विश्वास एक बार फिर इस पवित्र सेवा पर लौट सके।
खैर हम आगे की खबर में हम आपको पूरे साक्ष्य के साथ बताएंगे उस अस्पताल का नाम और उनके द्वारा दिया जा रहा कमीशन और वो भी डॉक्टरों के नाम के साथ साथ उन्हें दी जा रही कमीशन की किन्हें कितना किस महीने में मिला है। खाश बात तो ये रहेगा कि इसमें सरकारी डॉक्टर भी शामिल है हम उनका नाम भी उजागर करेंगे।
आगे की खबर में हम आपको बताएंगे सारा सच।


