
खबर
एसईसीएल में दवा खरीदी की जिम्मेदारी जहां पूरी तरह से पर्चेज डिपार्टमेंट (क्रय विभाग) के पास है, वहीं अब यह सवाल उठने लगा है कि फिर आखिर मनेन्द्रगढ़ के एसईसीएल सेंट्रल हॉस्पिटल और सुहागपुर (एम.पी.) में एमडी और एमएस डॉक्टरों के पास प्राइवेट कंपनियों के एमआर (मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव) क्यों लगातार पहुंच रहे हैं?
जब दवाइयों की खरीदी डॉक्टर नहीं बल्कि क्रय विभाग करता है, तो फिर एमआर से मिलकर डॉक्टर किसके लिए और कहां की दवाइयां लिख रहे हैं? जानकारी के मुताबिक ये दवाइयां एसईसीएल अस्पताल के बाहर की दवा दुकानों में उपलब्ध कराई जाती हैं। ऐसे में यह सीधा इशारा करता है कि कुछ डॉक्टरों की बाहर की मेडिकल दुकानों से मिलीभगत हो सकती है।
मनेन्द्रगढ़ में तो हालात यह हैं कि डॉ. सुमन पाल (एमडी मेडिसिन) के पास एमआर की लगातार आवाजाही बनी रहती है, जो कई गंभीर सवाल खड़े करता है।

चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, किसी सरकारी या सार्वजनिक उपक्रम के डॉक्टर द्वारा दवा कंपनियों के एमआर से निजी संपर्क रखना हितों के टकराव (Conflict of Interest) की स्थिति पैदा करता है, जो कि मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (अब एनएमसी) के प्रोफेशनल कंडक्ट रेगुलेशन के विरुद्ध है।
क्या बनता है भ्रष्टाचार का मामला?
यदि यह सिद्ध होता है कि डॉक्टरों द्वारा लिखी गई दवाइयां एसईसीएल अस्पताल के बजाय बाहर की निजी दवा दुकानों से मरीजों को खरीदने के लिए मजबूर किया जा रहा है, तो यह मामला सीधे तौर पर —
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988
आईपीसी की धारा 409 (आपराधिक विश्वासघात)
आईपीसी की धारा 420 (धोखाधड़ी)
के तहत दंडनीय अपराध की श्रेणी में आ सकता है।
रेफरल के बदले कमीशन: सीधा अपराध
सुहागपुर (एम.पी.) के एक डॉक्टर द्वारा एसईसीएल के मरीजों को बिलासपुर के एक बड़े सूचीबद्ध प्राइवेट हॉस्पिटल में रेफर किया जा रहा है, जो सामान्य प्रक्रिया मानी जा सकती है।
लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि इन मरीजों को भेजने के बदले उसी प्राइवेट हॉस्पिटल द्वारा एक बाहरी व्यक्ति वीरेंद्र, जो कि हॉस्पिटल के बाहर प्राइवेट लैब संचालक बताया जा रहा है, उसके खाते में पैसे ट्रांसफर किए गए हैं।
जब डॉक्टर से इस बारे में सवाल किया गया तो जवाब मिला कि वह व्यक्ति एक प्राइवेट लैब संचालक है और वही बेहतर बता पाएगा।
अब बड़ा सवाल यह है कि —
छाती रोग विशेषज्ञ द्वारा भेजे गए मरीजों का कमीशन एक लैब संचालक के खाते में क्यों गया?
उस लैब संचालक के पास मरीजों की सूची कैसे पहुंची?
क्या यह पूरा नेटवर्क सुनियोजित कमीशन रैकेट का हिस्सा है?
बताया जा रहा है कि “वीरेंद्र“ के खाते में आए पैसों से जुड़े तारीख, अमाउंट और अकाउंट नंबर तक के ठोस सबूत मौजूद हैं, जिन्हें झुठलाना आसान नहीं है।
सुहागपुर (एम.पी.) से एसईसीएल के मरीजों को बिलासपुर के एक सूचीबद्ध प्राइवेट हॉस्पिटल में भेजे जाने के बदले यदि किसी तीसरे व्यक्ति या लैब संचालक के खाते में भुगतान किया गया है, तो यह गंभीर आपराधिक साजिश की ओर संकेत करता है।
कानूनी जानकारों के अनुसार, यह स्थिति —
आईपीसी धारा 120B (आपराधिक षड्यंत्र)
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 व 13
मनी ट्रेल के आधार पर पीएमएलए (धनशोधन निवारण अधिनियम)
के तहत जांच योग्य बनती है, यदि लेन-देन का संबंध सरकारी मरीजों की रेफरल प्रक्रिया से जुड़ा पाया जाता है।
सबूत मौजूद होने पर FIR अनिवार्य
सूत्रों के मुताबिक, जिन खातों में पैसे ट्रांसफर हुए हैं, उनके अकाउंट नंबर, डेट और अमाउंट से जुड़े ठोस दस्तावेजी साक्ष्य मौजूद हैं।
कानूनी प्रक्रिया के अनुसार, यदि ऐसे साक्ष्य उपलब्ध हैं तो —
एसईसीएल प्रबंधन,
स्थानीय प्रशासन, या
एंटी करप्शन ब्यूरो
को प्राथमिक सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज कराना अनिवार्य है। ऐसा न करना स्वयं में कर्तव्य में लापरवाही (Dereliction of Duty) मानी जा सकती है।
सेवा नियमों के तहत भी सख्त कार्रवाई संभव
एसईसीएल के आंतरिक सेवा नियमों के तहत भी यदि कोई अधिकारी या डॉक्टर —
बाहरी व्यावसायिक लाभ लेता है,
मरीजों को निजी संस्थानों की ओर मोड़ता है,
या विभागीय प्रक्रिया को दरकिनार करता है,
तो उस पर निलंबन, विभागीय जांच और सेवा से बर्खास्तगी तक की कार्रवाई संभव है।
क्या यह संगठित स्कैम है?
पूरे मामले में संकेत साफ हैं कि यह सिर्फ व्यक्तिगत लेन-देन नहीं बल्कि डॉक्टर–एमआर–प्राइवेट हॉस्पिटल–लैब नेटवर्क के जरिए सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था को चूना लगाने का संगठित खेल हो सकता है।
अब सवाल उठता है कि —
एसईसीएल प्रबंधन अब तक क्यों मौन है?
संबंधित प्राइवेट हॉस्पिटल को ब्लैकलिस्ट क्यों नहीं किया जा रहा?
जिन डॉक्टरों पर आरोप हैं, उनके खिलाफ जांच कब शुरू होगी?
सूत्रों के मुताबिक एसईसीएल के एक डिप्टी सीएमओ ने भी इस लेन-देन को लेकर कई चौंकाने वाली बातें स्वीकार की हैं और यह भी बताया है कि इसमें सिर्फ निचले स्तर के नहीं बल्कि कुछ उच्च अधिकारियों की भी मिलीभगत हो सकती है, जिससे सरकारी खजाने को सीधा नुकसान पहुंचाया जा रहा है।
जनहित में निष्पक्ष जांच जरूरी
यह मामला केवल प्रशासनिक अनियमितता नहीं बल्कि सरकारी स्वास्थ्य संसाधनों के दुरुपयोग और संगठित कमीशन तंत्र का संकेत देता है।
ऐसे में आवश्यक है कि —
सीबीआई या राज्य एंटी करप्शन ब्यूरो से स्वतंत्र जांच हो,
पूरे मनी ट्रेल की फॉरेंसिक ऑडिट कराई जाए,
और दोषियों पर त्वरित कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
अन्यथा यह मामला न सिर्फ एसईसीएल बल्कि पूरे सार्वजनिक स्वास्थ्य तंत्र की साख पर गंभीर आघात बनकर रहेगा।
सेवा नियमों के तहत भी सख्त कार्रवाई संभव
एसईसीएल के आंतरिक सेवा नियमों के तहत भी यदि कोई अधिकारी या डॉक्टर —
बाहरी व्यावसायिक लाभ लेता है,
मरीजों को निजी संस्थानों की ओर मोड़ता है,
या विभागीय प्रक्रिया को दरकिनार करता है,
तो उस पर निलंबन, विभागीय जांच और सेवा से बर्खास्तगी तक की कार्रवाई संभव है।
जल्द होंगे और बड़े खुलासे
यह मामला यहीं खत्म नहीं होता।
जल्द ही पूरे दस्तावेजी सबूतों के साथ यह भी उजागर किया जाएगा कि किस तरह बिलासपुर के प्राइवेट हॉस्पिटल का धंधा एसईसीएल मरीजों के सहारे फल-फूल रहा है और किस-किस स्तर पर संरक्षण मिल रहा है।
अब देखना यह है कि एसईसीएल प्रबंधन इस गंभीर आरोप पर कब संज्ञान लेता है या फिर यह मामला भी फाइलों में दबा दिया जाएगा।


