“फर्जी EWS से खूंटाघाट की हिंसा तक—किसके संरक्षण में फलफूल रहा संदीप लोनिया?”

बिलासपुर तहसील कार्यालय एक बार फिर प्रदेशभर में सुर्खियों में है। कभी लेन-देन, कभी लापरवाही और अब प्राइवेट कर्मचारियों की खुली दबंगई ने पूरे प्रशासनिक ढांचे पर सवाल खड़े कर दिए हैं। हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि तहसील कार्यालय में सरकारी कर्मचारियों से ज्यादा प्राइवेट लोग काम संभालते नजर आते हैं, और फाइलों से लेकर फैसलों तक उन्हीं की पकड़ बताई जा रही है।
सबसे चौंकाने वाली घटना 25 दिसंबर 2025 की है। शासकीय अवकाश के दिन बिलासपुर तहसील के बाबू और प्राइवेट कर्मचारी टीम पिकनिक मनाने खूंटाघाट पहुंचे। वहां शराब और मांसाहार की पार्टी के बीच शराब की कमी को लेकर विवाद हुआ, जो देखते-देखते हाथापाई और पत्थरबाज़ी में बदल गया।
इस पूरे बवाल के केंद्र में रहा संदीप लोनिया, जो तहसील में प्राइवेट कर्मचारी के रूप में कार्यरत है। बताया जा रहा है कि लोनिया ने रतनपुर से अपने 4-5 साथियों को बुला लिया, जिसके बाद हालात और बेकाबू हो गए। किसी तरह लोगों के हस्तक्षेप से मामला शांत कराया गया, लेकिन सवाल अब भी ज़िंदा हैं।

फ़ोटो में छत्तीसगढ़ शासन का लोगो एक प्राइवेट कर्मचारी के पीछे
कौन है संदीप लोनिया?
संदीप लोनिया वर्तमान में तहसीलदार आकाश गुप्ता के यहां प्राइवेट कर्मचारी के रूप में काम कर रहा है। वह मूलतः रतनपुर का निवासी है। यह उसका पहला विवाद नहीं है। इससे पहले जब गरिमा ठाकुर बिलासपुर की तहसीलदार थीं, तब भी लोनिया उनके यहां कार्यरत था और उसी दौरान फर्जी EWS प्रमाणपत्र का मामला सामने आया था, जिसमें उसकी भूमिका बताई गई थी। उस वक्त भी मामला सुर्खियों में रहा—लेकिन ठोस कार्रवाई फिर भी नहीं हुई।
संरक्षण किसका? चुप्पी क्यों?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि
आखिर एक प्राइवेट कर्मचारी को तहसील कार्यालय में इतनी ताकत कहां से मिल रही है?
क्या बिना उच्च अधिकारियों की सहमति के वह इतने सालों से यहां टिक सकता है?
आम लोगों से “किस काम का कितना लगेगा” तय करने की चर्चा अगर सही है, तो क्या यही उसका असली कवच है?
लोगों का कहना है कि यदि फर्जी EWS मामले में समय रहते कड़ी कार्रवाई होती, तो 25 दिसंबर की शर्मनाक घटना शायद होती ही नहीं। तहसील परिसर में इस घटना की चर्चा हर जुबान पर है, फिर भी SDM से लेकर तहसीलदार तक की चुप्पी कई संदेहों को जन्म देती है।
प्रशासन के सामने कड़े सवाल
आज एक प्राइवेट कर्मचारी में इतनी हिम्मत हो गई कि वह सरकारी बाबू पर हाथ छोड़ दे, और उसके खिलाफ कोई कार्रवाई न हो—तो क्या कल वह और बड़ी घटना को अंजाम नहीं देगा?
क्या यही चुप्पी उसके हौसले और बुलंद नहीं करेगी?
अब देखना यह है कि
बिलासपुर प्रशासन सच में कार्रवाई करेगा या फिर यह मामला भी फाइलों में दफन कर दिया जाएगा।
जनता जवाब चाहती है—और जवाब अब टालना मुश्किल होता जा रहा है।


