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मध्यम वर्ग के अभिभावकों पर बढ़ता आर्थिक बोझ, तय दुकानों से खरीद की मजबूरी, आदेशों के बावजूद कार्रवाई शून्य—शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)।
शिक्षा को देश में बच्चों का मौलिक अधिकार माना गया है, लेकिन बिलासपुर में यही शिक्षा अब अभिभावकों के लिए भारी आर्थिक बोझ बनती जा रही है। सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता को लेकर भरोसा कम होने के कारण अभिभावक मजबूरी में निजी स्कूलों का रुख करते हैं, लेकिन यहां उन्हें शिक्षा नहीं, बल्कि एक सुनियोजित “व्यापार मॉडल” का सामना करना पड़ रहा है।
शिक्षा या व्यवसाय?
वर्तमान समय में शहर के कई निजी स्कूल शिक्षा संस्थान कम और व्यापारिक केंद्र ज्यादा नजर आ रहे हैं। ट्यूशन फीस के नाम पर मोटी रकम वसूली जाती है, वहीं सालभर में स्पोर्ट्स डे, वार्षिकोत्सव, समर कैम्प जैसे आयोजनों के नाम पर अलग से हजारों रुपये वसूले जाते हैं। सवाल यह है कि क्या यह सब शिक्षा व्यवस्था का हिस्सा है या फिर अभिभावकों की जेब पर सुनियोजित डाका?
किताब और यूनिफॉर्म में ‘फिक्सिंग’ का खेल
बिलासपुर के कई बड़े निजी स्कूलों में किताब और यूनिफॉर्म को लेकर कथित “सेटिंग” का खेल खुलेआम चल रहा है।
स्कूल पहले से ही तय कर देते हैं कि किताबें और ड्रेस किस दुकान से खरीदनी हैं। अभिभावकों के पास कोई विकल्प नहीं बचता।
दयालबंद स्थित विवेक बुक डिपो इसका प्रमुख उदाहरण बनकर सामने आ रहा है, जहां से शहर के कई नामी स्कूलों की किताबें ही उपलब्ध हैं।
इनमें प्रमुख रूप से:
🔴 डीपीएस तिफरा
🔴 जैन इंटरनेशनल स्कूल, सकरी
🔴 एचीवर्स पब्लिक स्कूल, मंगला चौक
🔴 एचीवर्स की गतौरी ब्रांच
जैसे संस्थानों का नाम सामने आ रहा है।
महंगी किताबें, बिना छूट का बोझ
अभिभावकों का कहना है कि इन स्कूलों की किताबें इतनी महंगी हैं कि एक सामान्य परिवार की कमर टूट जाए।
उदाहरण के तौर पर—
अगर घर में दो बच्चे कक्षा 3 और कक्षा 5 में पढ़ते हैं, तो सिर्फ किताबों पर ही लगभग ₹10,000 तक खर्च आ जाता है।
छूट के नाम पर सिर्फ कॉपियों पर 10% की राहत दी जाती है, जबकि कॉपियों का कुल खर्च 500-600 रुपये ही होता है—ऐसे में यह राहत भी महज औपचारिकता बनकर रह जाती है।
यूनिफॉर्म भी तय दुकान से ही
यही स्थिति यूनिफॉर्म को लेकर भी है।
सत्यम चौक, चंद्रिका होटल के पीछे स्थित एक तय दुकान से ही ड्रेस खरीदने की बाध्यता बताई जा रही है।
यहां भी अभिभावकों को प्रिंट रेट पर ही सामान लेना पड़ता है—ना मोलभाव, ना विकल्प।
प्रशासन की चुप्पी पर सवाल
सबसे बड़ा सवाल प्रशासन की भूमिका को लेकर उठ रहा है।
हर साल नए सत्र की शुरुआत में यह मुद्दा जोर पकड़ता है, लेकिन कुछ महीनों बाद मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है।
सूत्रों के अनुसार, बिलासपुर के शिक्षा विभाग द्वारा शायद इस तरह की जबरन बिक्री पर रोक लगाने के आदेश भी जारी किए गए थे।
लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि उन आदेशों का कोई असर नजर नहीं आता।
सवाल उठता है—
अगर आदेश जारी हुए हैं, तो उनका पालन क्यों नहीं हो रहा?
और अगर पालन नहीं हो रहा, तो कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही?
सीबीएसई के नाम पर धोखा?
हाल ही में शहर में कुछ स्कूलों पर यह भी आरोप लगे कि उन्होंने अभिभावकों से सीबीएसई के नाम पर फीस ली, लेकिन पढ़ाई सीजी बोर्ड की करवाई गई।
यह मामला सामने आने के बाद शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर और भी बड़े सवाल खड़े हो गए हैं।
निष्कर्ष: ‘मौन’ ही सबसे बड़ा सवाल
बिलासपुर में निजी स्कूलों का यह पूरा सिस्टम अब एक संगठित आर्थिक ढांचे की तरह काम करता नजर आ रहा है, जहां अभिभावक सिर्फ “ग्राहक” बनकर रह गए हैं।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस पूरे मामले पर शासन और प्रशासन की चुप्पी खुद उसकी कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करती है।
क्या शिक्षा अब अधिकार नहीं, बल्कि ‘लक्जरी’ बनती जा रही है?
और अगर हां, तो इसका जिम्मेदार कौन?


