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निजी अस्पताल, डॉक्टरों और सिस्टम के गठजोड़ पर गंभीर सवाल — क्या ‘धृतराष्ट्र’ बने बैठे हैं जिम्मेदार अधिकारी?

कोरबा/कोतमा/बिलासपुर।
बिलासपुर के एक निजी अस्पताल और एसईसीएल के स्वास्थ्य तंत्र के बीच कथित मिलीभगत का एक बड़ा मामला सामने आया है, जिसमें महज 14 मरीजों के इलाज के नाम पर करीब 2.41 करोड़ रुपये का बिल बनाकर पास भी करा लिया गया। यह मामला न सिर्फ आर्थिक अनियमितताओं की ओर इशारा करता है, बल्कि पूरे सिस्टम में गहरे जमे नेटवर्क और कार्यशैली पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।
पहले भी हुआ था खुलासा, अब सामने आया बड़ा आंकड़ा
पूर्व में हमारे द्वारा प्रकाशित खबरों में इस बात का खुलासा किया गया था कि कैसे बिलासपुर का एक बड़ा निजी अस्पताल, एसईसीएल और रेलवे स्वास्थ्य विभाग के कुछ जिम्मेदार लोगों के साथ मिलकर मरीजों की आड़ में करोड़ों की रकम निकालने का खेल खेल रहा है।
और ये भी बताया गया था कि इस पूरे नेटवर्क को संचालित करने के लिए दो एमबीए डिग्रीधारी पीआरओ तैनात हैं, जो अलग-अलग क्षेत्रों में सक्रिय रहकर मरीजों और मुख्यालय में बिल पास कराने की “सेटिंग” करते हैं।
14 मरीज… और 2,41,42,531 रुपये का बिल
सूत्रों के अनुसार, कोरबा, बैकुंठपुर, मनेन्द्रगढ़, विश्रामपुर, सुहागपुर (म.प्र.) और जमुना कोतमा (म.प्र.) से रेफर किए गए महज 14 मरीजों के इलाज के नाम पर 2,41,42,531/- रुपये का बिल तैयार कर पास भी करा लिया गया।
यह सिर्फ एक उदाहरण है — ऐसे कई और मरीजों की सूची होने का दावा भी किया जा रहा है, जिन सबके नाम पर करोड़ों के बिल बनाए गए। इसी से इस निजी अस्पताल और एसईसीएल के मिलीभगत की होने का संदेह जाता है।
क्या यह संभव है बिना मिलीभगत के ?
सबसे बड़ा सवाल यही है—
क्या कोई निजी अस्पताल यूँ ही करोड़ों का बिल बना सकता है ?
क्या बिना अधिकारियों की सहमति के ऐसे बिल पास हो सकते हैं ?
मामले में सामने आए आंकड़े चौंकाने वाले हैं:
👉40 दिन भर्ती: 34.50 लाख रुपये
👉10 दिन भर्ती: लगभग 10 लाख रुपये
👉12 दिन भर्ती: करीब 15.50 लाख रुपये
औसतन प्रति मरीज प्रतिदिन का खर्च 1 लाख रुपये या उससे अधिक बैठता है, जो अपने आप में संदेह पैदा करता है।
“बिल्ली को दूध की रखवाली” — जांच प्रक्रिया पर सवाल
सूत्र बताते हैं कि जिन डॉक्टरों द्वारा मरीजों को निजी अस्पताल में भेजा जाता है, वही प्रारंभिक स्तर पर बिल की जांच भी करते हैं। यानि जो रेफर कर रहा है, वही अप्रूवल की प्रक्रिया में भी शामिल है—ऐसे में पारदर्शिता पर सवाल उठना लाजिमी है। हालांकि जाँच की प्रक्रिया आगे भी दूसरे विभाग करते है परंतु प्रारंभिक जाँच वही डॉक्टर द्वारा किया जाता है मतलब “बिल्ली को दूध की रखवाली” वाली कहावत यहाँ तार्किक रूप से ठीक बैठता है।
इतना ही नहीं, सुहागपुर के एक छाती रोग विशेषज्ञ ने हमे बताया था कि “जो बिल हमारे पास जांच के लिए आता है, उसमें वास्तव में कौन सी दवा दी गई और कौन सी नहीं, इसकी पुष्टि हम कर ही नहीं सकते।”
यानी बिल की वास्तविकता की गहन जांच संभव ही नहीं है। ऐसे में निजी अस्पतालों के लिए यह स्थिति “सोने पर सुहागा” साबित हो रही है—जहां रेफरल भी अपने नेटवर्क से और जांच भी औपचारिक, तो गड़बड़ी पकड़ में आने की संभावना बेहद कम हो जाती है।
पर यहाँ फिर एक सवाल उठता है कि फिर एसईसीएल द्वारा निजी अस्पताल के बिलों उन दवाइयों का रैपर क्यों लगवाया जाता है जिनका इन्हें जाँच में पता ही नही चल पाता ?
PR0 नेटवर्क और कमीशन का खेल
खबरों के अनुसार, दो पीआरओ पूरे नेटवर्क को संचालित करते हैं। ये लोग अलग-अलग क्षेत्रों में जाकर डॉक्टरों से संपर्क करते हैं और मरीज भेजने के एवज में कमीशन का कथित लेन-देन करते हैं।
यही कारण है कि लगातार मरीजों को चुनिंदा इस निजी अस्पतालों में भर्ती कराया जाता है, जहां लंबे समय तक भर्ती दिखाकर भारी-भरकम बिल तैयार किए जाते हैं।
पहले भी संदेह के घेरे में रहे डॉक्टर
28 फरवरी 2026 को सामने आए एक मामले में कोतमा के एक रिटायर्ड डॉक्टर की भूमिका भी सवालों के घेरे में रही थी।
और रहे क्यों न जब वही कोतमा एरिया से मरीज के महज 12 दिन की भर्ती पर लगभग 15.50 लाख रुपये का बिल बनाया गया और पास भी हो गया, जो इस पूरे पैटर्न को और मजबूत करता है।
महीनों भर्ती, लाखों का बिल — बड़ी साजिश की ओर इशारा
लगातार सामने आ रहे मामलों में एक समानता दिख रही है—
मरीजों को महीनों तक भर्ती रखना
प्रतिदिन लाखों का खर्च दिखाना
और फिर आसानी से बिल पास हो जाना
यह पूरा घटनाक्रम किसी सुनियोजित नेटवर्क की ओर इशारा करता है।
क्यों मौन हैं उच्च अधिकारी?
सूत्रों के मुताबिक, इस पूरे मामले की जानकारी एसईसीएल के उच्च अधिकारियों को मौखिक रूप से दी जा चुकी है, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई सामने नहीं आई है।
उनके इस मौन स्थिति को देखते हुए कोतमा के उस रिटायर्ड डॉक्टर द्वारा हमे दिए गए बयान की “निजी अस्पताल एसईसीएल के सभी बड़े और उच्च अधिकारियों से मिलीभगत किये बैठा है” वाली आरोप को क्या चरितार्थ करता प्रतीत नही होता ?
ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या यह सिर्फ लापरवाही है या फिर मिलीभगत की परतें और गहरी हैं?
एसईसीएल अधिकारी की “धृतराष्ट्र” की भूमिका पर सवाल
मामले को लेकर यह भी आरोप लगाया जा रहा है कि कुछ अधिकारी सबकुछ जानते हुए भी अनदेखा कर रहे हैं।
ऐसे में “धृतराष्ट्र” की भूमिका निभाने का सवाल अब खुलकर उठने लगा है।
CVC, कोल इंडिया और PMO तक पहुंचेगी शिकायत
अब इस पूरे प्रकरण को लेकर CVC, कोल इंडिया और प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) में औपचारिक शिकायत दर्ज कराने की तैयारी की जा रही है, ताकि निष्पक्ष जांच हो और दोषियों पर सख्त कार्रवाई हो सके।
अगली कड़ी में और खुलासे
आने वाली खबरों में रेलवे स्वास्थ्य विभाग से जुड़े ऐसे ही बिलों और नेटवर्क का खुलासा किया जाएगा।
👉जुड़े रहिए “लोकनायक” के साथ… क्योंकि ये सिर्फ खबर नहीं, बल्कि सिस्टम में छिपे बड़े खेल का पर्दाफाश है।


