चंद लोगो के निजी स्वार्थ का भार किसपे ?

बिलासपुर।
आज के व्यापारीकरण के दौर में निजी स्वार्थ के लिए कोई भी हद पार करने से पीछे नहीं हट रहा। व्यापारियों का तो काम ही व्यापार करना है, लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि अब सरकारी विभागों के कुछ अधिकारी और कर्मचारी भी व्यापारी से बड़े व्यापारी बन बैठे हैं। खासकर स्वास्थ्य विभाग, जहां सीधे जनता का जीवन दांव पर होता है, वहां भी निजी फायदे का खेल चरम पर है।
हमारी टीम ने दूसरे जिले में जाकर स्वास्थ्य विभाग की हकीकत जानने के लिए दो दिन रुक के खोजबीन की। इसमें चौंकाने वाला सच सामने आया—एसईसीएल और रेल्वे के सरकारी डॉक्टर एक प्राइवेट हॉस्पिटल से मिलकर ‘एक हाथ दे, एक हाथ ले’ की नीति पर काम कर रहे हैं।
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एसईसीएल के डॉक्टरों की कार्यशैली – “काम कम, आमदनी ज्यादा”
जांच में सामने आया कि एसईसीएल के अस्पतालों में डॉक्टर सुबह करीब 10:30 बजे आते हैं और दोपहर 12:30–1 बजे तक ही मरीज देखते हैं। इसके बाद वे लगभग साढ़े तीन घंटे का लंच ब्रेक लेकर घर चले जाते हैं। फिर शाम 3:30 से 4 बजे के बीच लौटते हैं और 6 बजे छुट्टी का समय हो जाता हैं।
यानि सुबह 2 घंटे और शाम को 2 घंटे का काम।
लेकिन यहीं खत्म नहीं—कई डॉक्टर लंच ब्रेक और शाम की छुट्टी के बाद घर पर मरीज देखते पाए गए। जाहिर है कि वहां वे मुफ्त में इलाज नहीं करते होंगे, यानी एक और आय का जरिया।
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दवा कंपनियों के एमआर की लाइन
एसईसीएल अस्पतालों के गलियारों में प्राइवेट कंपनियों के मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव्स (एमआर) की लंबी कतार देखी गई। डॉक्टरों के पास जाकर एमआर अपनी-अपनी कंपनियों की दवाइयां बताते हैं, सैंपल देते हैं और गिफ्ट (जैसे पेन आदि) भी थमाते हैं। कुछ डॉक्टर इन दवाइयों की फोटो मोबाइल में खींचते भी देखे गए।
अब बड़ा सवाल यह है—जब एसईसीएल दवा खरीद का काम टेंडर प्रक्रिया से करता है तो डॉक्टर एमआर से क्यों मिलते हैं? यह मुलाकातें उनकी नीयत और कार्यशैली पर सीधा प्रश्नचिह्न लगाती हैं।
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इम्पेनएल्ड प्राइवेट हॉस्पिटल से गुप्त गठजोड़
सबसे बड़ा खेल तो यहां है—
रेल्वे और एसईसीएल के डॉक्टर जानबूझकर मरीजों को उस इम्पेनएल्ड हॉस्पिटल में भेजते हैं जहाँ बदले में उन्हें अच्छा कमीशन मिलता है। यह कमीशन ज्यादातर नकद में लिया जाता है, लेकिन कई बार डॉक्टर अपने पत्नी, रिश्तेदार या खास परिचित के खाते में भी पैसे मंगवाते हैं।
इस काम को और आसान बनाने के लिए प्राइवेट हॉस्पिटल ने दो पीआरओ (पब्लिक रिलेशन ऑफिसर) रखे हैं। ये दोनों सरकारी डॉक्टरों और हॉस्पिटल के बीच पुल का काम करते हैं और पैसों के लेन-देन की पूरी जिम्मेदारी संभालते हैं।
हमारे पास इसका पूरा ब्यौरा पूरे साक्ष्यों के साथ मौजूद है—कौन सा डॉक्टर किस रूप में पैसा ले रहा है, किसके नाम से, कितनी रकम। सही समय पर यह नामजद सबूतों के साथ उजागर किया जाएगा।
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जांच से तिलमिलाया प्राइवेट हॉस्पिटल
हमारी जांच की भनक लगते ही संबंधित प्राइवेट हॉस्पिटल में तिलमिलाहट मच गई। दबाव बनाने की कोशिशें शुरू हो गईं, ताकि टीम पीछे हट जाए। कुछ प्रतिष्ठित लोगों के जरिए भी अप्रत्यक्ष दबाव बनवाने की कोशिश किया गया।
इतना ही नहीं—जब हमारी टीम एसईसीएल हॉस्पिटल में जानकारी लेने पहुँची, तो इनका नेटवर्क इतना तगड़ा है कि जब तक हम एक डॉक्टर से मिले उसके बाद दूसरे जिले के बाकी डॉक्टर जवाब देने के डर से भाग खड़े हुए। एक डॉक्टर तो जवाब से बचने के लिए बिलासपुर आ गए और उस हॉस्पिटल के एक पीआरओ से बाहर मिल संबंधित मुद्दे पर शायद चर्चा कर दूसरे दिन लौट गए।
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रेल्वे अस्पताल में भी वही कहानी
रेल्वे अस्पताल का हाल तो और भी चौंकाने वाला है।
एक डॉक्टर अकेले ही महीने में 25–30 मरीज प्राइवेट हॉस्पिटल भेज रहा है। इसके एवज में हर मरीज पर उसे मोटा कमीशन मिलता है।
रेल्वे के मरीजों का प्राइवेट अस्पताल में इलाज का बिल अक्सर बहुत बड़ा बनाया जाता है और रेल्वे विभाग खानापूर्ति वाली जांच-पड़ताल कर पास भी कर देता है।
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असर किस पर पड़ रहा है?
यह पूरा खेल सरकार और संबंधित विभाग की जानकारी में है या फिर जानबूझकर अनजान बने रहना ही बेहतर समझा जा रहा है। लेकिन सवाल यह है कि इसका बोझ आखिरकार पड़ता किस पर है?
सरकार पर – क्योंकि सरकारी खजाने से बेवजह का खर्च होता है।
विभाग पर – क्योंकि उसकी साख लगातार गिर रही है।
जनता पर – क्योंकि सरकारी अस्पताल में सही इलाज न मिलने पर वह प्राइवेट अस्पतालों के चंगुल में फँस जाती है और इलाज के नाम पे सरकारी खर्चे का भारी बोझ उठाना पड़ता है।
पर शायद यहाँ इन परिस्थितियों में किसी को ज्यादा फर्क इस लिए भी नही पड़ता कि सरकारी डॉक्टर सोचते है कि बिल कितना भी बने विभाग पैसा देगा मुझे तो ज्यादा बिल पर ज्यादा कमीशन मिलेगा, वही ज्यादा बिल बनने से मरीजों को भी कोई फर्क नही पड़ता वो सोचते है मुझे कौन सा अपने जेब से देना है। और इन सब का फायदा प्राइवेट हॉस्पिटल उठा रहा है।
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प्राइवेट हॉस्पिटल की प्लानिंग
जबसे हमारी टीम इस खोजबीन में लगी है तो उनके द्वारा ये भी कोशिश किया जा रहा है कि किसी तरह पैसे के लेनदेन का लांछन लगा फसा दिया जाए।
और तब तक के लिए सरकारी डॉक्टरों को हमसे मिलने की मनाही की गई है उनसे कहा गया है कि आपको जैसे ही पता चले कि मीडिया वाला आया है तो आप हॉस्पिटल से निकल जाए।
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निष्कर्ष
स्वास्थ्य विभाग से जुड़ा यह गठजोड़ जनता के जीवन से सीधा खिलवाड़ है। डॉक्टर, जिन्हें जनता की सेवा के लिए सरकारी वेतन मिलता है, वही निजी लालच में प्राइवेट हॉस्पिटल का एजेंट बन बैठे हैं। सवाल यह है कि—
क्या सरकार और विभाग आंख मूँद कर बैठे रहेंगे? या इस “एक हाथ ले, एक हाथ दे” की नीति पर चल रहे गोरखधंधे पर रोक लगेगी?



