NOC के नाम पर अस्पतालों पर ‘ब्रेक’! बिलासपुर में अटका स्वास्थ्य सिस्टम, आयुष्मान मरीज सबसे ज्यादा परेशान?

Gajendra Singh
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भवन शाखा का काम निर्माण देखना या अस्पतालों की सांस रोकना?

बिलासपुर/ नगर निगम बिलासपुर की भवन निर्माण शाखा इन दिनों एक ऐसे मुद्दे को लेकर सवालों के घेरे में है, जिसका सीधा असर शहर की स्वास्थ्य व्यवस्था और आम जनता की जेब पर पड़ता दिखाई दे रहा है। मामला निजी अस्पतालों को जारी किए जाने वाले कथित “अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC)” का है, जिसके अभाव में कई नए अस्पतालों का लाइसेंस जारी नहीं हो पा रहा है।

सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि आखिर नगर निगम की भवन निर्माण शाखा का मूल कार्य क्या है? नियमों के अनुसार यह शाखा भवन अनुज्ञा, नक्शा स्वीकृति, निर्माण मानकों की निगरानी, अवैध निर्माण पर कार्रवाई और पूर्णता प्रमाणपत्र जैसे कार्यों के लिए जिम्मेदार मानी जाती है। लेकिन अब यही शाखा अस्पताल संचालन के लिए जरूरी NOC प्रक्रिया में महीनों तक फाइलें रोकने के आरोपों से घिरती नजर आ रही है।

क्या सिर्फ बिलासपुर में लागू है यह व्यवस्था?

जानकारों के अनुसार छत्तीसगढ़ के अधिकांश नगर निगमों में अस्पताल संचालन के लिए फायर NOC, स्वास्थ्य विभाग की अनुमति, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की स्वीकृति, क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट रजिस्ट्रेशन और भवन अनुमति जैसी प्रक्रियाएं आवश्यक होती हैं।

लेकिन “नगर निगम भवन शाखा से अलग से अस्पताल संचालन NOC” का स्पष्ट और एकसमान नियम हर जिले में दिखाई नहीं देता।

ऐसे में सवाल उठ रहा है कि यदि यह प्रक्रिया सिर्फ बिलासपुर में कठोर रूप से लागू की जा रही है, तो क्या इसके लिए स्पष्ट गाइडलाइन, समय-सीमा और जवाबदेही तय की गई है?

महीनों से अटकी फाइलें, इलाज के विकल्प कम

सूत्रों की मानें तो कई निजी अस्पतालों की फाइलें महीनों से लंबित हैं। बिना NOC अस्पतालों का लाइसेंस जारी नहीं हो पा रहा, और बिना लाइसेंस अस्पताल पूर्ण रूप से संचालन शुरू नहीं कर पा रहे। इसका सीधा असर शहर में उपलब्ध बेड, इलाज की सुविधा और प्रतिस्पर्धी चिकित्सा सेवाओं पर पड़ रहा है।

स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े लोगों का कहना है कि जब नए अस्पताल समय पर शुरू नहीं होंगे, तो मरीजों का दबाव पुराने बड़े अस्पतालों पर ही बढ़ेगा। इसका परिणाम लंबी प्रतीक्षा, महंगा इलाज और सीमित विकल्प के रूप में सामने आ सकता है।

आयुष्मान मरीजों पर सबसे बड़ा असर?

विशेषज्ञ मानते हैं कि इसका सबसे ज्यादा प्रभाव आयुष्मान भारत योजना से इलाज कराने वाले गरीब और मध्यमवर्गीय मरीजों पर पड़ सकता है।
क्योंकि आयुष्मान से जुड़े अस्पतालों की संख्या सीमित होने पर मरीजों को—

दूरस्थ अस्पतालों में जाना पड़ सकता है

समय पर बेड नहीं मिल सकता

निजी खर्च बढ़ सकता है

जांच और भर्ती में देरी हो सकती है

यानी प्रशासनिक देरी का सीधा असर आखिरकार मरीज की जेब और उसकी जिंदगी दोनों पर पड़ सकता है।

सुधार जरूरी, लेकिन समय सीमा भी जरूरी

यदि नगर निगम किसी सुधारात्मक व्यवस्था या सुरक्षा मानकों को मजबूत करने के उद्देश्य से NOC प्रक्रिया लागू कर रहा है, तो विशेषज्ञ यह भी सवाल उठा रहे हैं कि क्या उसके लिए तय समय सीमा नहीं होनी चाहिए?

क्या किसी अस्पताल की फाइल महीनों तक लंबित रखना उचित प्रशासनिक प्रक्रिया कही जा सकती है?

क्या इसके लिए ऑनलाइन ट्रैकिंग, पारदर्शी आपत्ति प्रणाली और निर्धारित निपटान अवधि लागू नहीं होनी चाहिए?

अब उठ रहे बड़े सवाल

क्या भवन निर्माण शाखा अपने मूल कार्यक्षेत्र से आगे बढ़ रही है?

क्या NOC प्रक्रिया पारदर्शी है?

क्या सभी अस्पतालों के लिए समान नियम लागू हैं?

क्या देरी की जिम्मेदारी तय होगी?

और सबसे बड़ा सवाल — इसका खामियाजा आखिर आम मरीज क्यों भुगते?

बिलासपुर में स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार के इस दौर में अब निगाहें प्रशासन पर टिक गई हैं कि वह इस पूरे मामले में स्पष्ट नीति, पारदर्शिता और समयबद्ध समाधान कब तक सामने लाता है।

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